School of Economics | *🔆जलमार्गों से बच सकते हैं सालाना 50 अरब डॉलर*
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*🔆जलमार्गों से बच सकते हैं सालाना 50 अरब डॉलर*

 

गुजरात में घोघा और दहेज के बीच 615 करोड़ रुपए की नौका सेवा के पहले चरण का उद्‌घाटन

अमिताभ कांत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भावनगर जिले के घोघा और भरूच के दहेज के बीच अपनी तरह की पहली अत्याधुनिक नौका सेवा का उद्‌घाटन किया है। यह और इसके बाद दूसरे चरण में हजीरा परियोजना से देश में परिवहन और माल व सेवा देने के क्षेत्र में आमूल बदलाव की शुरुआत हो रही है। भारत में लॉजिस्टिक लागत अत्यधिक ऊंची है और जलमार्गों की पूरी क्षमता का दोहन करने से लोगों, सामान, वस्तुओं और वाहनों की ढुलाई व परिवहन में तेजी आएगी। लागत और समय घटने का मैन्यूफैक्चरिंग और निर्यात पर अत्यधिक फायदेमंद प्रभाव पड़ेगा। जैसे सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात के बीच खम्बात की खाड़ी में रोल ऑन रोल ऑफ फेरी के प्रोजेक्ट से 8 घंटे की यात्रा समय सिर्फ 1 घंटे रह जाएगा और 360 किलोमीटर का फासला महज 31 किलोमीटर रह जाएगा।देश में जल परिवहन के लायक 14,500 किलोमीटर के अंतर्देशीय और 7,517 किलोमीटर के समुद्र तटवर्ती जलमार्ग हैं। तटवर्ती जहाज सेवा और अंतर्देशीय जल परिवहन ईंधन के हिसाब से किफायती, पर्यावरण अनुकूल और लागत की दृष्ट से सस्ता परिवहन विकल्प है खासतौर पर बल्क कार्गो की दृष्टि से। कंटेनर वेसल से जो उत्सर्जन होता है वह प्रति टन प्रति किलोमीटर 32 से 36 ग्राम कार्बन डाई-ऑक्साइड का होता है, जबकि भारी सड़क वाहनों से समान मानकों पर 51 से 91 ग्राम कार्बन डाई-ऑक्साइड निकलती है। सड़क परिवहन पर प्रति-टन प्रति किलोमीटर औसतन 1.50 रुपए, रेल परिवहन पर 1 रुपए लागत आती है, जबकि जलमार्गों के लिए यह लागत सिर्फ 25 से 30 पैसे है।

सड़क माध्यम से एक लीटर ईंधन से 24 टन-किमी, रेल से 85 टन-किमी और जल परिवहन से इतने ही ईंधन में प्रति किलोमीटर 105 टन माल ले जाया जा सकता है। यदि लॉजिस्टिक की लागत जीडीपी के 14 से 9 फीसदी तक घटाई जा सके तो देश हर साल 50 अरब डॉलर बचा सकेगा, जिससे उत्पादों की कीमतें भी घटेंगी । भारत में परिवहन के लायक जितने जलमार्ग हैं उनमें करीब 5,200 किलोमीटर (36 फीसदी) प्रमुख नदियों और करीब 485 किलोमीटर (3 फीसदी) नहरों में मौजूद हैं। फिर जलमार्गों के विकास में भूमि अधिग्रहण और अन्य मुद्‌दे भी कम हैं। फिलहाल सिर्फ 4,500 किलोमीटर अंतर्देशीय जलमार्ग का वाणिज्यिक उपयोग हो रहा है और घरेलू माल 1 फीसदी से भी कम ले जाया जाता है। देश की तटरेखा के संपूर्ण विकास के लिए सरकार ने मार्च 2015 में ‘सागरमाला’ कार्यक्रम शुरू किया हैै।रोल ऑन और रोल ऑफ (आरओ-आरओ) जलमार्ग परियोजना में ऐसे आरओ-आरओ जहाज व नौकाएं हैं, जिन्हें कार, ट्रक, सेमीट्रैलर ट्रक, ट्रैलर और रेलरोड कार जैसे पहिये वाला माल ले जाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इन्हें जहाज पर पहियों पर चलाकर अथवा किसी प्लेटफॉर्म वाहन के जरिये चढ़ाया व उतारा जा सकता है। इसमें जेटी, संबंधित पोर्ट टर्मिनल और कनेक्टिविटी का बुनियादी ढांचा भी शामिल है। जहां यात्री जेटी का इस्तेमाल सिर्फ यात्रियों के लिए होगा, आरओ-आरअो जेटी में रैम्प लगे होंगे ताकि सामान को आसानी से चढ़ाया व उतारा जा सके।

गुजरात के आरओ-आरओ प्रोजेक्ट के तहत दो टर्मिनलों के बीच 100 वाहनों और 250 यात्रियों को ले जाया जा सकेगा। खास बात यह है कि फेरी ऑपरेटर किराया वर्तमान में बसों द्वारा लिए जा रहे किरायों के समान ही रखेंगे। देश में असम, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र और केरल में विभिन्न आरओ-आरअो प्रोजेक्ट में वह क्षमता है कि जिससे भीतरी व भौगोलिक रूप से अलाभप्रद इलाकों की पूरी क्षमता का दोहन संभव हो सकेगा।भारतीय रेल भी बिहार में माल वाहनों और त्रिपुरा में पेट्रोलियम पदार्थों की ढुलाई के लिए आरओ-आरओ सेवा शुरू कर रही है।विश्व बैंक की 2016 की रिपोर्ट में लॉजिस्टिक परफॉर्मेंस इंडेक्स पर भारत 2014 की 54वीं रैंक से उठकर 35वीं रैंक पर आ गया है। इसमें और सुधार के लिए विभिन्न परिवहन माध्यमों में एकीकृत आवाजाही के लिए प्राथमिकताएं तय की जा रही हैं । जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा है कि इससे डीज़ल और पेट्रोल के आयात पर भारत की निर्भरता घट जाएगी और देश वृद्धि की नई ऊंचाई हासिल करेगा।

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