School of Economics | सेबी की बनाई एक समिति के अनुशंसाओ का विश्लेषण
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सेबी की बनाई एक समिति के अनुशंसाओ का विश्लेषण

 


• भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की बनाई एक समिति ने विवाद समाधान प्रक्रिया के नियामकीय ढांचे में सुधारों पर अपनी अनुशंसाएं दे दी हैं।
नोट – भारतीय पूंजी बाजार इस मामले में लगातार जूझता रहा है।
• इस समिति ने कुछ पहल की है और कुछ मोर्चों पर चूक भी की है लेकिन सुधार संबंधी कुछ अहम सुझावों के साथ सामने आना काफी मायने रखता है।
• इस रिपोर्ट में इस विषय पर अमेरिकी जानकारी की भरमार है लेकिन फैसला सुनाने संबंधी जटिल सुधारों की कमी है। हालांकि इसमें मौजूदा समाधान प्रणाली के कुछ मनमाने एवं असाध्य पहलुओं को दुरुस्त करने पर ध्यान दिया गया है।
• समिति ने अर्जित लाभों और निहित हानियों के परिमाणन संबंधी सिद्धांतों पर एक और रिपोर्ट जारी करने की बात कही है जिसका बेसब्री से इंतजार किया जाना चाहिए।

रिपोर्ट में कुछ अहम सुधारात्मक उपायों का जिक्र होना प्रशंसनीय है। जो इस प्रकार है –
1. पहला, केवल दो सदस्यीय समिति बनाने के लिए सेबी की तारीफ की जानी चाहिए।
2. इस समिति में एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय में सेबी के स्थायी वकील को जगह दी गई है।
3. दरअसल अधिक सदस्यों वाली बड़ी समितियां किसी जटिल एवं तकनीकी मुद्दे की बारीकियों पर ध्यान केंद्रित करने में चुनौतीपूर्ण साबित होती हैं।
4. दूसरा, मौजूदा समाधान ढांचे में अपकृत्यों का जातीय स्वरूप भी सुधारों के दायरे में रखा गया है।
5. समिति ने मौजूदा विनियमों में दिखने वाले बेतुकेपन से दूर रहने की बात कही है।
6. मसलन कुछ अपकृत्यों का कभी भी समाधान नहीं हो सकता है, सेबी भले ही अपने विवेक पर उन मामलों का निपटारा भी कर सकता है।
7. तीसरा, समाधान का प्रस्ताव पेश कर पाने की समयसीमा को बदला गया है लेकिन सेबी ने प्राकृतिक न्याय के अनुरूप सुधार करने का शानदार मौका गंवा दिया है।
8. फिलहाल नोटिस मिलने के 60 दिनों के भीतर समाधान के लिए प्रस्ताव रखे जा सकते हैं। मौजूदा दौर में भी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुपालन को लेकर एक अद्र्ध-न्यायिक अधिकारी का नजरिया दूसरे अधिकारी से अलग होता है।
9. कुछ अधिकारी मामले से संबंधित रिकॉर्ड का पूरा मुआयना करने की इजाजत देते हैं जबकि कुछ अधिकारी चुनिंदा तथ्यों तक ही पहुंच होने देते हैं। कई बार तो निष्पक्ष मुआयने की मांग को लेकर महीनों तक कानूनी लड़ाई चलती रहती है।
10. रिकॉर्ड का मुआयना पूरा हो जाने के बाद 60 दिनों के भीतर जवाब देने की समयसीमा शुरू होनी चाहिए ताकि कारण बताओ नोटिस में आरोपित व्यक्ति के पास पूरे मामले को समझ पाने का मौका मिले और उसके गुण-दोषों के आधार पर वह समाधान प्रस्ताव रख सके।
11. आरोपों को चुनौती देने का मन बना चुके पक्ष के लिहाज से भी ऐसा करना सही होगा।
12. समिति इस प्रक्रिया में भी सुधारों का प्रस्ताव रख सकती थी लेकिन ऐसा नहीं किया गया है।
13. असल में समिति ने यह प्रस्ताव रखा है कि अब 60 दिनों के बजाय 120 दिनों के भीतर समाधान प्रस्ताव रखा जा सकता है लेकिन उसे विलंब के लिए 25 फीसदी वार्षिक दर से ब्याज देने के लिए राजी होना होगा।
14. चौथा, विवाद निपटान संबंधी नजरिये के संदर्भ में इस समिति ने कहा है कि सेबी को पड़ताल पूरी किए बगैर किसी भी समाधान प्रस्ताव पर विचार नहीं करना चाहिए।
15. वास्तव में, समिति ने यह कहा है कि सेबी को ऐसा रवैया तभी अपनाना चाहिए जब इससे जांच पूरी करने में मदद मिलती हो। यह पीछे की तरफ जाने वाला कदम है। इसके बजाय समिति को इस पर गौर करना चाहिए था कि आज भी सेबी कुछ मामलों में जांच पूरी किए बगैर नोटिस जारी करता है। अगर किसी मामले में कारण बताओ नोटिस जारी किया जा सकता है तो उसे समाधान के लायक भी माना जाना चाहिए।
16. समिति ने समाधान प्रक्रिया जारी रहने के दौरान भी अंतरिम आदेश पारित कर पाने की सेबी के अधिकारों को बरकरार रखने की बात कही है। अगर ऐसा है तो नोटिस जारी होने के पहले ही सेबी के पास जाने के लिए भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग की तर्ज पर इनाम भी रखा जाना चाहिए।
17. आखिर में, इस समिति ने माना है कि समाधान की शर्तों से संबंधित हिस्से या पहचान को गोपनीय रखना भी समाधान की एक शर्त हो सकती है।
18. समिति ने गोपनीयता पर विस्तृत चर्चा की है लेकिन वह इसे एक विचारणीय विषय के तौर पर स्वीकार करने के लिए ही राजी हुई है। इस पर अधिक तवज्जो और चर्चा की जरूरत है। संभवत: सार्वजनिक टिप्पणियां आने से इस पर एक जानकारीपरक चर्चा हो सकेगी।

अन्य महत्वपूर्ण बिन्दु
• इसके बजाय समिति ने सिद्धांतों पर आधारित समाधान ढांचे की तरफ बढऩे का सुझाव रखा है जिसमें बाजार पर व्यापक असर रखने वाले, अधिक निवेशकों को हुए नुकसान और बाजार की निष्ठा को चोट पहुंचाने वाले मामलों का समाधान नहीं करने की बात कही गई है।
• वैसे यह पैमाना काफी हद तक व्यक्तिनिष्ठ है क्योंकि हरेक मामला तकनीकी रूप से बाजार की प्रामाणिकता को प्रभावित कर सकता है। लेकिन इस तरह का रवैया रखने से कम-से-कम यह संकेत तो जाएगा कि कुछ अपकृत्य दूसरों से बेहतर या बदतर होते हैं।
• इससे इन मामलों की सुनवाई होने पर न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोगों को भी संदेश भेजे जा सकेंगे।
• ऐसे मामलों का भी निपटारा कर सकने की सेबी की क्षमता को काफी हद तक वस्तुनिष्ठ मानक के जरिये बरकरार रखा गया है, जैसे कथित आरोपी की तरफ से कोई उपचारात्मक उपाय करना।

निष्कर्ष
1. समिति ने अस्वीकृति संबंधी नियमों का विस्तृत खाका भी पेश किया है लेकिन सेबी और आरोपित व्यक्ति के बीच होने वाली शुरुआती चर्चाओं के नियमन पर कोई बात नहीं की है।
2. इस समय दो सिद्धांतों के बीच विरोधाभास नजर आता है। जहां बचाव पक्ष की ताकत अप्रासंगिक मानी जाती है वहीं कथित उल्लंघन के ‘बड़े’ एवं ‘छोटे’ चरित्र को ध्यान में रखने की बात कही जाती है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

भारतीय प्रतिभूति और विनियम बोर्ड ( सेबी) के विषय मे
• सेबी अर्थात भारतीय प्रतिभूति और विनियम बोर्ड (SEBI-Securities and Exchange Board of India) की स्थापना 12 अप्रैल 1988 को एक गैर संवैधानिक निकाय के रूप में हुआ था।
• सेबी की स्थापना के बाद 30 जनवरी 1992 को भारत सरकार ने संसद में एक अध्यादेश के माध्यम से सेबी को एक संवैधानिक निकाय का दर्जा दिया।
• सेबी का मुख्यालय मुंबई में स्थित है।
• सेबी के कुछ क्षेत्रीय कार्यालय भी हैं जो क्रमशः दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता और अहमदाबाद में स्थित है।

अध्यक्ष
• सेबी के संपूर्ण प्रबंधन में 6 सदस्य होते हैं।
• इसमें से एक सदस्य अध्यक्ष होता है,और अन्य पांच सदस्य के अलग कार्य के होते हैं।
• सेबी में एक अध्यक्ष होता है, जिसका नामांकन भारत सरकार के द्वारा किया जाता है।
• इनका कार्यकाल 3 साल के लिए होता है या 65 वर्ष की उम्र तक होता है, इसमें से जो भी पहले हो।
• बाकी चार सदस्यों को भी भारत सरकार ही चुनकर भेजती है।
• इनमें से 2 सदस्य वित्त मंत्रालय के जानकार और 2 कानून के जानकार होते हैं।
• शेष 1 सदस्य आरबीआई(RBI) से होते हैं, उनका चयन आरबीआई के अधिकारियों में से किया जाता है।

सेबी की स्थापना का उद्देश्य:-
1. शेयर बाजार में निवेशकों के हितों की रक्षा करना:
• बहुत से निवेशक शेयर बाजार में बहुत से कंपनियों के शेयर को खरीद और बिक्री किया करते हैं, ऐसे लोगों के साथ अगर कुछ गलत होता है तो निवेशक सेबी में अपना शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
• सेबी का पहला काम है निवेशकों के हितों की रक्षा करना।

2. पूंजी बाजार को विकसित करना:
• पूंजी बाजार क्या होता है? पूंजी बाजार वह होता है जो कंपनियों को कम समय या ज्यादा समय के लिए लोन प्रदान करता है।
• कंपनियां या औद्योगिक घराना पूंजी बाजार के माध्यम से लोन ले पाते हैं, तो ऐसे बाजार को विकसित करना भी सेबी का प्रमुख कार्य है।

3. शेयर बाजार के सभी अंगों को सेबी के ढांचे के अधीन लाना:
• शेयर बाजार के कई अंग होते हैं। जैसे की कंपनियां, निवेशक, ब्रोकर, दलाल, कंपनियों के निवेशक इन सभी को सेबी के आधीन लाना या (सेबी का जो नियम है उसके अधीन लाना) भी सेवी का एक प्रमुख कार्यों में से एक है। ताकि पूरा का पूरा जो शेयर मार्केट है वह सेबी के बनाए हुए नियम से चल सके और किसी भी निवेशक के साथ धोखा ना हो।

4. शेयर बाजार में अनैतिक व्यापार पर रोक लगाना:
• शेयर बाजार में जो भी व्यापार अनैतिक हो, जो भी कंपनी गलत तरीके से व्यापार कर रहा हो, उस पर रोक लगाना और शेयर बाजार मैं अनैतिक तरीके से किसी भी कंपनी के शेयर को गलत तरीके से खरीद या बिक्री पर रोक लगाना भी सेबी के कार्यों में से है।

5. इनसाइडर ट्रेडिंग पर रोक लगाना:
इनसाइडर ट्रेडिंग क्या होता है?
• इनसाइडर ट्रेडिंग का मतलब होता है अंतरंग व्यापार, मतलब कई बार ऐसा होता है कि कई कंपनियां जो अपना शेयर जारी कर रहा होता है, ऐसे में जो उस कंपनियों के अधिकारी होते हैं जिनको कि उस कंपनी के गुप्त व्यापार के बारे में पता हो या कुछ गुप्त जानकारी पता हो तो ऐसे में वे अधिकारी उस शेयर के माध्यम से ज्यादा फायदा कमा लेते हैं।
• ऐसे लोगों या कंपनियों की गतिविधियों को रोकना भी सेबी का एक प्रमुख कार्य है।

6. म्यूच्यूअल फंड सहित अन्य सामूहिक रत्नों का पंजीकरण करना:
• देश में बहुत सारी ऐसी स्कीम में लॉन्च होती है जिसमें बहुत सारे लोगों से एक साथ पैसा लेकर शेयर बाजार में लगाया जाता है।
• ऐसे फंड का पंजीकरण करना तथा इस पर इनकी देखभाल करना भी सेबी का ही कार्य है।

7. शेयर मार्केट क्या है?
• मुख्य रूप से हम यह कह सकते हैं कि सेबी, शेयर बाजार में होने वाला हर गतिविधि पर ध्यान रखती है। तथा यह ब्रोकर, निवेशक के साथ धोखा ना करें इन सब चीजों पर रोक लगाना ही सेबी का मुख्य मकसद एवं कार्य है।

साभार-निर्माण IAS

 

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